Tuesday, November 14, 2017

779

भोर की बेला
सुदर्शन रत्नाकर

भोर की बेला
धूसर आसमान
सोए हैं पक्षी
थका -थका सा चाँद
मंद पवन
तारों का रंग फीका
दुल्हन रात
कैसे रंग निराले
लुटा शृंगार
आँसुओं का सैलाब
भीगी धरती
गुपचुप कलियाँ
सूनी डगर
सन्नाटा है पसरा
ओर न छोर।
प्रकृति नहीं हारी
करवट ली
बदल गया सब
उगा सूरज
नभ नील झील में
बिखरे रंग
जाग उठा जीवन
जग- ऑगन
कलरव करते
उड़े विहग
खिल गईं कलियाँ
शीतल हवा
छू रही तन -मन
आलस्य छोड़
उठ गया इन्सान
नव  स्फूर्ति आह्वान।

-0-

Thursday, October 5, 2017

778

विश्वास  -एक स्मृति जर्मन प्रवास की
कमला घटाऔरा 

शादी के बाद अपना देश छोड़ विदेश की धरती पर कदम रखते ही लगा मैं किसी अजनबी दुनिया में आ गई हूँ । किसी जादूनगरी में । बडे बडे कई मंजिले घर । साफ सुथरी सड़कें । विभिन्न भाषा भाषी लोग अलग पहरावे अलग खान पान । उन का बोला हुआ एक भी शब्द समझ  से परे । मैं यहाँ कैसे रहूँगी ? मन विचित्र से ख्यालो में खोया रहता ।पति के काम पर जाने के बाद स्टूडियो फ्लैट के बंद कमरे में खिड़की के पास खड़ी होकर आते जाते लोगों को देखा करती । न कोई अड़ोसी-पड़ोसी , न कोई मिलने जुलने वाला रिश्तेदार । उस तीन मंजिली विल्डिंग में  सब जैसे अपने अपने पिंजरें में बंद रहते । वहाँ कौन कौन रहता है ,किसी को किसी की शक्ल से भी परिचय नहीं था ।

जादूगर द्वारा ले जाकर पिंजरे में बंद  रखी राजकुमारी की कहानी स्मरण हो आई । बाहर विदेश में अकेला रहता व्यक्ति विवाह कर लाई दुलहन के लिए उस जादूगर से कम नहीं लगता । उसके काम पर जाने के बाद दुल्हन के लिए बंद कमरा पिंजरे जैसा ही लगता है ।
हफ्ते में एक बार जब शॉपिंग के लिए हम बाहर जाते तो लोगों की भीड़  में  मेरी आँखें अपने देश के लोगों को तलाशती ।कोई भी ऐसा चेहरा नजर न आता जो भारतवासी हो या पंजाब से हो । जब कि कहा यह जाता है ऐसा कोई भी देश नहीं यहाँ पंजाबी न पहुँचे हों । मुझे यह बात अविश्वसनीय लगती । 80 के दशक में मुझे यहाँ जर्मन में तो कोई  भी पंजाबी नजर  नहीं आया । वहाँ का कार्निवाल भी देखा । लोगों के उस समुद्र में भी कोई पगड़ीधारी नहीं दिखा । रेगिस्तान में बिना जल के सफर करने वाली हालत में लगा मैं तो यहाँ प्यासी ही मर जाऊँगी , बोलना ही भूल जाऊँगी । टीवी चलता रहता मगर एक भी बात समझ न आती । वहाँ की डच भाषा की  गिनती और कुछ कामचलाऊ  शब्द  अवश्य सीख लिये थे । दिन जैसे  तैसे कटते रहे ।
फिर जब अपनी प्रेगनेंसी के दौरान  हस्पताल जाना हुआ तो वहाँ एक दिल्ली की महिला मिली ।हैलो- हाय के बाद बातचीत शुरू हुई । पता चला वह मेरे घर के समीप ही कहीं रहती है वहाँ । परिचय के साथ आना जाना भी शुरू हुआ ।उसके पास उस की बहन घूमने आई हुई थी ।कभी कभी मेरे पास आ जाती । उससे बातें करके लगता मैं परदेस में नहीं अपने ही देश में हूँ । बातें कर के मन खुश हो जाता । उदासी गायब हो जाती ।
हम जब किसी से जान पहचान बना लेते हैं तो किसी काम की मदद  लेने का हक भी समझ लेते हैं ।अचानक उनसे बिना पूछे ऐसा काम उन पर डाल देते हैं  कि वह न 'हाँ' कर सके और न 'ना' कर सके । उन्हे बेबी बर्थ के बाद वापस चले जाना था । सिर्फ दो साल के वर्किंग बीजा पर आए थे वे लोग । महिला की बहन कुछ दिन पहले घूमने आई थी । एक दिन बहन अपने सामान का एक अटैची लेकर मेरे द्वार  पर आ खड़ी ,"बोली हम जा रहें हैं वापस । यह सामान आज नहीं जा पा रहा । मैं कल आ कर ले जाऊँगी ।" वह बहुत जल्दी में थी । मैं हाँ-ना करूँ  , कुछ पूछूँ इस से पहले ही  वह दन दनाती लौट गई ।
मैं डर गई । यह क्या मुसीबत अपने गले डाल ली । पति से बिना पूछे । अपनी भाषा में बोलने वाले से परिचय करने की ,उसके घर आने जाने की मुझे कहीं कोई भारी कीमत न चुकानी पड़ जाए । पति के आने पर कुछ बताती उन्होने पहले ही प्रश्न की गोली दाग दी द्वार के पास पड़ा अटैची देख कर ,'यह क्या है?'
बताने पर उनका पारा चढ़ने ही वाला था कि तभी डोर बेल हुई । कोई द्वार पर था ।
वहाँ की पुलिस किसी इल्लीगल व्यक्ति की तलाश में सब से पूछताछ कर रही थी ।  हमारे यहाँ भी जरूरी पूछताछ करने आई । कुछ प्रश्न पूछे ,हमारे पास पोर्ट देखे और चली गई । पति द्वारा मुझसे जो पूछताछ होनी थी उसका मेरे पास कोई उत्तर नहीं था । मैं गाँव जैसे माहौल में पली बाहर की दुनिया के बारे में अनभिज्ञ ,कुछ भी नहीं जानती थी कि किसी के काम के लिए 'हाँ' कहना खतरे का सबब भी बन सकता है । सरल स्वाभाव के कारण  विश्वास कर लिया था वह कल अपना सामान ले जाएगी । कहा है तो क्यों नहीं आएगी ?
"तुम्हारे पास क्या गारंटी है वह आकर सामान ले जाएगी ? पति की शंका ने मुझे फिर चिन्ता में डाल दिया । न जाने अटैची में क्या हो ? कुछ चोरी का सामान या स्मगलिन्ग  का सामान या कोई असला हत्थियार हुआ , तो  हम तो पकडे जाएँगें  ना ?"
 ( उन की बात आज के वक्त के बारे में तो सोलह आने सही थी । अटैची में कुछ भी हो सकता था । )
मैं खामोश  रह कर सुबह का इन्तजार करने लगी ।मन में सोच रही थी अगर हम किसी पर भी विश्वास न करे तो यह दुनिया तो अजनबियों का जंगल बन जाए इन्सानियत ही खतम हो जाए । किसी की भी कोई मदद करने को आगे न आए । हमें भी मजबूरी के वक्त किसी की मदद की  जरूरत पड़ सकती है ।जहाज में , बस या  ट्रेन में हम एक विश्वास पर ही चढ़ते हैं कि वह हमें हमारी मंजिल तक पहुँचा देगी । वहाँ अविश्वास क्यों नहीं ? उसने अपने देश का समझ कुछ  घंटो के लिए अपने सामान के लिए  जगह  ही चाही है तो  क्या हम अपने देशवासी के लिये इतना भी नहीं कर सकते । यह बात गुस्से से भरे पति को तो मैं समझा नहीं सकती थी । मन को बतिया कर प्रभु पर सब छोड़ सो गई । सुबह के इन्तजार में । पति को कैसे कह पाती अगर उसने सामान नहीं ले जाना होता तो वहीं अपने फ्लैट में फेंक सकती थी । मैं जानती थी कुछ कहने पर प्रश्नों के चक्रव्यूह में घिर जाऊँगी । इसलिए एक चुप  सौ सुख में भला समझ चुप रही । सुबह पति के काम पर जाने के बाद मेरे कान जैसे द्वार से चिपक गए। अपने कहे अनुसार वह अटैची लेने आई ,तो जान में जान आई । वह अटैची के साथ जो चिन्ता और शंकाओं का अँधेरा लाई थी अपनी धन्यवादी मुस्कान के पल्लू में समेट कर ले गई । घर जैसे अशुभ की चिन्ताओं से मुक्त हो गया । विश्वास ने लाज रख ली ।


विश्वास आगे

हारे  शंका अँधेरा
शुभ्र सवेरा ।

Sunday, September 17, 2017

777

1-डॉ.जेन्नी शबनम
1
हाल बेहाल
मन में है मलाल
कैसी ज़िन्दगी?
जहाँ धूप न छाँव
न तो अपना गाँव। 
2
ज़िन्दगी होती
हरसिंगार फूल,
रात खिलती
सुबह झर जाती,
ज़िन्दगी फूल होती। 
3
बोझिल मन
भीड़ भरा जंगल
ज़िन्दगी गुम,
है छटपटाहट
सर्वत्र कोलाहल। 
4
दीवार गूँगी 
भेद सारा जानती,
कैसे सुनाती?
ज़िन्दगी है तमाशा
दीवार जाने भाषा। 
5
कैसी पहेली?
ज़िन्दगी बीत रही
बिना सहेली,
कभी- कभी डरती
ख़ामोशियाँ डरातीं। 
6
चलती रही
उबड-खाबड़ में 
हठी ज़िन्दगी,
ख़ुद में ही उलझी
निराली ये ज़िन्दगी। 
7
फुफकारती
नाग बन डराती
बाधाएँ सभी,
मगर रुकी नहीं,
डरी नहीं, ज़िन्दगी। 
8
थम भी जाओ,
ज़िन्दगी झुँझलाती 
और कितना?
कोई मंज़िल नहीं
फिर सफ़र कैसा?
9
कैसा ये फ़र्ज़ 
निभाती है ज़िन्दगी
साँसों का क़र्ज़,
गुस्साती है ज़िन्दगी 
जाने कैसा है मर्ज़। 
10
चीख़ती रही
बिलबिलाती रही
ज़िन्दगी ख़त्म,
लहू बिखरा पड़ा
बलि पे जश्न मना।
  
-0-

2-विभा रश्मि 
जुगनू तम में  आया 
आशा चमकी फिर 
था  रोशन  हमसाया ।
मन डूबा - उतरा है
आलोड़न में अब
भीगा हर कतरा है ।
3
थक जाना मत राही
साँस तलक चल  तू
मंजिल पा दिलचाही । 
4
मेरा घर सूना है 
आ भर खुशियाँ तू
उजियारा दूना  है ।
5
बातों के घोड़े थे 
दौड़े सरपट वो
सपनों को जोड़े थे ।
6
आखर बहुतेरे हैं 
काग़ज़ तो कोरा 
भावों के  डेरे हैं ।

-0-

Wednesday, September 13, 2017

776

अज्ञात भय
कमला घटाऔरा

 वह नहीं चाहती थी कि बच्चों के साथ घूमने जा बुढ़ापे में घूमने- फिरने का कोई आनन्द तो  है नही।वहाँ का विशाल मंदिर देखने का बड़ी बेटी का बहुत मन था  वह उसे  मना भी तो नहीं  कर सकती थी। बच्चों की ख़ुशी के लिए उसे आना पड़ा।मंदिर देख- घूम फिर कर वे एक जगह थककर सुस्ताने को बैठ गईं।  एक बेटी अपने  बच्चों के लिए कुछ लेने एक ओर  चली गई तथा दूसरी बेटी मंदिर की पूजा अर्चना देखने चल दी। इतनी दूर मंदिर देखने आ हैं साथ में पूजा भी देख लें तो सोने पे सुहागा।

माँ को उनके इंतजार का एक एक पल भारी हो रहा था थोड़ी देर कह कर ग। अभी तक एक भी लौटकर नहीं आई ।भय का साँप उन्हें अपनी और आता दिखाई देने लगा। अनजाने लोगों की आती- जाती भीड़ देख वह और भयभीत होने लगीं। कहीं उनकी बेटियाँ इधर उधर न हो जाएँ ,साथ के छोटे बच्चों को सँभालते - सँभालते माँ को  भूल ही न जाएँ। वह किसे पुकारेगी ? वह कहाँ ढूँढेगी उन्हें ? तरह -तरह के विचार आकर उसे  चिंतित करने लगे। वह दहल -सी ग

इस समय याद आ ग उसे अपनी खो हु दबंग भाभी ,जिसने कभी अपनी जवानी में घर घुसे चोरों को डंडे से मार मारकर खदेड़ दिया था ,लेकिन बुढ़ापे में अपने बच्चों से मिलने बड़े शहर क्या गई, तो लौटकर घर ही न पहुँची, जबकि साथ में भैया भी थे। वह टॉयलेट ही ग थी। वहीं से कहीं गायब हो ग। सारी  ट्रेन छान मारी उस का कोई अता- पता न चला। वर्षों उस की तलाश जारी रही। नहीं मिली सो नहीं मिली। …

यह सोचकर वह और डर ग। वह अकेली किस ओर पहले जाए ,छोटी को मंदिर से बुलाने गई, तो बड़ी आकर उसे यहाँ तलाश करेगी ,जहाँ बैठाकर ग है। दोनों हाथ पकड़कर ऊँची -नीची जगह से चलाकर लाई हैं कि कहीं ठोकर न लग जा। वह बार -बार अपना चश्मा साफ करके कभी इस ओर,  कभी उस ओर  उन के आने की राह देखने लगी। क्या करे ?अब दिन भी ढलने लगा था। बच्चे कहाँ जान पाते हैं माँ की इन चिंताओं को। माँ तो बस माँ है चिंताओं में ही कट जाती उम्र उसकी  
उतरी संध्या
डरी सहमी-सी माँ
अज्ञात भय।


Saturday, September 2, 2017

775

1-माहिया
परमजीत कौर 'रीत'
1
खामोशी कहती है
यादें सावन बन
आँखों से बहती हैं
2
आँगन के फूलों की
याद बहुत आ
नानी-घर झूलों की
3
नदिया- सा मन रखना
रज हो या कंकर
सब हँस-हँसकर चखना
4
नभ में मिलती राहें
पाँव धरा पे जो
मंजिल थामे बाहें
5
क्या खोना ,क्या पाना
अपनों के बिन ,जी!
क्या जीना,मर जाना
-0-
2-चोका
 पुष्पा मेहरा

लिपटा क्या है
इस कलेवर में
आया कहाँ से
है ज्ञात ना मुझको
बस ज्ञात है-
भिन्न रूपों-नातों से
आ जुड़े सभी
कहीं न कहीं हम
भिन्न भावों से,
जातिगत भेद से,
धर्म बंध से
मिल गए हैं जैसे
जन्म लेते ही
मधुरिम वात्सल्य,
ममता-डली
बिन माँगे ही हमें
निकटतम
निज माता-पिता से ,
प्रिय-अगाध
तन्द्रिल औ मायावी,
खोये अहं में
धीरे–धीरे जागे तो
मिली रौशनी
अनजाने सूर्य से
मिली चाँदनी
शुभ्रतम चाँद की,
मिलता सुख
संदली हवाओं का
निर्विरोध ही,
बढ़ते रहे सदा
दृश्य पथ  पे
नियति-डोर थाम
लिपटे हुए 
अहं मद में रमे
बेचते रहे
सपने,सुहावने
खरीद कर
सुख-राशि क्षणिक,
मन उनींदा
घिरा रहा तम से
दिखी ना राहें
मतवाले प्रेम की,
बिछड़े साथी
ज्यों नदी के किनारे
लहरें ऊँची
तोड़ती रहीं बाँध
सद्भावना का
जलस्तर स्वार्थ का
बढ़ता रहा
धँसते गए, डूबे,
गुह्य तल में
जो था घाना अँधेरा
मिला न द्वार
न मिली झिरी कोई,
न ही प्रकाश कभी
-0-
pushpa.mehra@gmail.com