Thursday, April 6, 2017

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सुशीला शिवराण
1.
आज छज्जे पे
चहकी है ज़िंदगी
मुद्दतों बाद
खिल उठा एकांत
पाकर एक संगी।      
2.
आशा की डोरी !
तुम टूट न जाना
सोए सपने
ले रहे हैं जम्हाई
जीवन पलने में।
3.
टूटी भी नहीं
बात बनी भी नहीं
भ्रम ने पाले
जलती सड़कों पे
कुछ भीगे सपने।
4.
यूँ ही अक्सर
छू लेती हूँ अक्षर
तेरी यादों के
यूँ भी छुआ है तुझे
हाँ, यूँ जिया है तुझे।
       

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20 comments:

Kavita Bhatt said...

वाह, सुंदर

Dr Purnima Rai said...

खूबसूरत चिंतन..आ.सुशीला जी

प्रियंका गुप्ता said...

क्या बात है ! सब एक से बढ़ कर एक पर ये वाला बहुत अच्छा लगा-
टूटी भी नहीं
बात बनी भी नहीं
भ्रम ने पाले
जलती सड़कों पे
कुछ भीगे सपने।

हार्दिक बधाई...|

Kashmiri Lal said...

sunder

sushila said...

धन्यवाद

sushila said...

आभार डॉ पूर्णिमा

sushila said...

धन्यवाद प्रियंका जी

sushila said...

धन्यवाद आदरणीय

sushila said...

आदरणीय कांबोज भैया सहित सभी का हार्दिक आभार।

sushila said...
This comment has been removed by the author.
ज्योति-कलश said...

सुंदर भावपूर्ण ताँका !
हार्दिक बधाई सुशीला जी !!

Rekha said...

बहुत बहुत बधाई !
भावभीने ताँका

Dr.Bhawna said...

Bahut bhavpurn likha hai bahut bahut badhai...

Dr.Bhawna said...

Bahut bhavpurn bahut bahut badhai...

Kamla Ghataaura said...

सुशीला जी बहुत सुन्दर भाव पूर्ण तांका हैं ।बधाई ।
टूटी भी नहीं / बात बनी भी नहीं / भ्रम ने पाले / जलती सडकों पे / कुछ भीगे सपने ।बहुत मोहक लगा ।

jyotsana pardeep said...

सुंदर एवँ भावपूर्ण ताँका !
हार्दिक बधाई सुशीला जी !!

sushila said...

आभार ज्योत्स्ना जी

sushila said...

धन्यवाद रेखा जी

sushila said...

आभार डॉ भावना

sushila said...

आभार बहना